प्रश्न- विजयनगर साम्राज्य के उथान एवं पतन का वर्णन करें ।

प्रश्न- विजयनगर साम्राज्य के उथान एवं पतन का वर्णन करें ।

 

 B.A History VVI Question No 4 And Answer In Hindi 2021

दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में  B.a में आने वाला History का  Question no 4 का  आंसर Hindi देने वाले हैं। जिसको आपने पढ़ लिया तो आप अच्छे मार्क्स से पास हो जायेंगे।
B.A Part-1

Question And Answer

प्रश्न-4. विजयनगर साम्राज्य के उथान एवं पतन का वर्णन करें ।

 Ans . विजयनगर राज्य की स्थापना मुसलमानों द्वारा दक्षिण में किये गये अत्याचारी का ही परिणाम थी । इस राज्य की स्थापना 1336 ई 0 में हरिहर और बुक्काराय नामक दो भाइयों ने की थी । इस कार्य में उन्हें संस्कृत के महान विद्वान यादव विद्यारण्य से उसी प्रकार सहायता मिली जैसी मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य को विष्णुगुप्त चाणक्य से मिली थी । सबसे पहले अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण के राज्यों पर आक्रमण किया था किन्तु उसने इन राज्यों से सम्पति लेकर उन्हें छोड़ दिया था । अलाउद्दीन के पश्चात् मुहम्मद तुगलक ने दक्षिण के राज्यों को अपने राज्य में सम्मिलित कर वहाँ पर मुसलमान सुबेदार नियुक्त किये । इन सुबेदारों के अत्याचारों से हिन्दू जनता में अत्यन्त असंतोष फैल गया । हरिहर और बुक्काराय द्वारा स्थापित इस राज्य की ओर मुहम्मद तुगलक ने अपने विद्रोहियों के दमन में व्यस्त रहने के कारण ध्यान नहीं दिया । विजयनगर आरम्भ में तो मुसलमानों के अत्याचारों से बचने के लिए बनाया गया था लेकिन इस नगर को अपने जन्म से ही इतना अनुकूल वातावरण मिला कि वह अल्पकाल में ही हिन्दू साम्राज्य का केन्द्र बन गया । प्रथम शासक हरिहर के उपरान्त 1343 ई ० में बुक्काराय गद्दी पर बैठा । उसके समय में विजयनगर राज्य का विस्तार बंगाल की खाड़ी में अरब सागर तक हो गया । कुछ इतिहासकारों के अनुसार इन भाइयों ने राजा की उपाधि ग्रहण कर ली होती तो मुसलमानों का ध्यान उनकी ओर भी आकर्षित हो जाता और वे नवजात विजयनगर राज्य को संकट में डाल देते । 

सन् 1379 ई 0 में बुक्काराय की मृत्यु पर हरिहर गद्दी पर बैठा । उसके समय में विजयनगर राज्य शक्तिशाली हो गया था तथा उसने महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण की । उसने दक्षिण के कई राज्यों को जीत लिया और बहमनी शासकों से जूझते हुए भी राज्य की शांति बनाये रखी । हरिहर द्वितीय योग्य शासक था और प्रजा उसका सम्मान करती थी । देवराय के समय में विजयनगर को मुसलमानों के आक्रमण का सामना करना पड़ा । अहमदशाह बहमनी ने आक्रमण कर विजयनगर में बड़ा रक्तपात किया । वह 1410 ई ० में विजयनगर की गद्दी पर बैठा पर उसके समय में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं हुई । देवराज द्वितीय के समय में मुसलमानो ने विजयनगर पर कई बार आक्रमण किया और हर बार विजयनगर को ही पराजय का सामनना करना पड़ा । देवराय ने मुसलमान धुड़सवारों की सेना गठित की फिर भी वह विजय लाभ नहीं कर सका । देवराय के उपरान्त राज्य में अराजकता फैल गई । कालान्तर में सन् 1490 ई ० में राजा नरसिह ने एक नये राज्य वंश की स्थापना की । इस वंश ने राज्य विस्तार के साथ - साथ शासन सुधार भी किया परन्तु वह वंश स्थायी नहीं हो सका । 

भारत का इतिहास 67 सन् 1505 ई ० में नरेश राय ने तीसरे राज्यवंश की स्थापना की । इस वंश का सबसे प्रतापी शासक कृष्णदेव राय था । उसके शासनकाल में विजयनगर अपनी चरम उन्नति पर पहुंच गया । उसने कृष्णा नदी के दक्षिण में अपनी सीमा का विस्तार किया । पूर्व में उसने उड़ीसा के राज्य का कुछ भाग भी जीत लिया । रायपूर के दोआब पर भी उसका अधिकार स्थापित हो गया । उसने संस्कृत तथा तेलगू साहित्य की उन्नति में भी योग दिया । सन् 1520 में उसकी मृत्यु हो गई । उसके मरते ही विजयनगर राज्य का पतन आरम्भ हो गया ।

साहित्य और कला ( Art and Literature ) : महाराज कृष्णदेव राय की विद्वता सराहनीय थी । साधारणत : यह कहा जा सकता है कि विजयनगर के राजे बड़े विद्या - प्रेमी थे । यही कारण था कि इस राज्य में संस्कृत , तेलगु , तमिल तथा कन्नड़ भाषाओं की आशातीत उन्नति हुई । इसी राज्य में वैष्णव धर्म तथा वैष्णव सम्प्रदाय की उन्नति हुई । राज्य भर में अनेकानेक मन्दिरों का निर्माण इस बात का परिचायक है कि इस काल में यहाँ के लोगों की धार्मिक भावना कितनी बलवती और पुष्ट हो गयी थी । 

विजयनगर के राजाओं ने दक्षिण भारत में हिन्दू - धर्म तथा हिन्दू - संस्कृति को नष्ट हो जाने से बचा लिया । ये राजे धर्मिक विचारवाले थे , तथापि धार्मिक पक्षपात तथा धर्म के नाम पर अत्याचार इन्होंने कभी नहीं किया । मुसलमान या ईसाई , पारसी या यहूदी किसी को भी हिन्दी बनाने के लिए इन्होंने विवश नहीं किया और न इनके गिरजे या मस्जिदें ढ़ाहे । विधर्मी होने पर भी उन पर कोई विशेष टैक्स नहीं लगाया , जैसा मुस्लिम सुल्तानों ने अपनी हिन्दू - प्रजा के जजिया - कर वसूल किया था । सर्वधर्मावलम्बियों को इन्होंने पूरी स्वतंत्रता दे दी । इसका परिणाम यह हुआ कि इनको प्रजा हिन्दू हो या अहिन्दू , सभी का सहयोग और सहानुभूति इन्हें प्राप्त हुई । इसी धार्मिक उदारता की प्रशंसा करते हुए बारबोसा कहता है- " राजा ने इतनी स्वतंत्रता दे रखी है कि हर कोई बेखटके कहीं भी आ जा सकता है और अपने अपने धर्मों का पालन कर सकता है । न किसी से कोई पूछताछ की जाती है कि वह हिन्दू है , ईसाई या मुसलमान , और न किसी को किसी प्रकार के सताया जाता है । " 

शासन प्रवन्ध ( Administration ) : विजयनगर राज्य का प्रधान शासन केन्द्र था । राज्य के सारे अधिकार राजा में केन्द्रित थे । शासन - सम्बन्धी , सेना सम्बन्धी तथा न्याय सम्बन्धी सभी बातों में राजा सर्वप्रथम था , तथापि यह स्वीकार किया जाता है कि वह निरंकुश शासक या स्वेच्छाचारी नहीं था । प्रजा की इच्छा अथवा हितों के विरुद्ध इन राजाओं ने आचरण नहीं किया । राज्य की उन्नति के लिए वे सदा प्रयत्नशील रहे । जन - कल्याण की चिन्ता इन्हें सदा बनी रहती थी । शांति भंग न होने पावे , इसकी चेष्ट इन्होंने हमेशा रखी । 

मंत्रिपरिषद : शासन - सम्बन्धी बातों में परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् थी । ये मंत्री राजा के द्वारा नियुक्त होते थे । अधिकांश ब्राह्मण ही मंत्री नियुक्त किये जाते थे , पर क्षत्रिय और वैश्य भी इनके मंत्री हुए । इन मंत्रियों के विषय में बताया जाता है कि इनमें कुछ खानदानी मंत्री थे और कुछ राजा के द्वारा चुने हुए भी हुआ करते थे । अब्दुल रज्जाक कहा है कि विजयनगर राज्य का एक सचिवालय भी था । मंत्रियों के अतिरिक्त अन्य प्रमुख राज्य कर्मचारियों का एक सचिवालय भी था । मंत्रियों के अतिरिक्त अन्य प्रमुख राज्य कर्मचारियों के कोषाध्यक्षा तथा वाणिज्य - व्यापार - निरीक्षक आदि थे । 

विजयनगर राज्य का प्रान्तीय शासन भी बंड़ा व्यवस्थित था । प्रान्तीय गवर्नर या राज्यपाल , अपने - अपने प्रांत में केन्द्रीय राजा की तरह सर्वप्रधान था । इन्हें राजा को वार्षिक आय - व्यय का चिट्ठा देना पड़ता था और आवश्यकता पड़ने पर सेना देनी पड़ती थी । इन प्रतिबन्धों को छोड़ ये गवर्नर या प्रान्ताधीश प्राय : स्वतंत्र थे । राजा इस बात पर अवश्य कड़ी नजर रखता था कि ये राजभक्त हैं या नहीं अथवा प्रजा इनसे खुशी है या नहीं । राजद्रोह या प्रजा के ऊपर अत्याचार करने पर राजा इन्हें कठिन से कठिन दंड दिया करता था । इन प्रांतीय शासकों से यह आशा की जाती थी कि ये सभी सम्भव उपायों से राज्य की उन्नति करेंगे , कृषि वाणिज्य को प्रोत्साहित करेंगे , मन्दिरों का निर्माण करेंगे तथा " बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय " कार्य करेंगे । 

आजकल की तरह उस काल में भी स्थानीय शासन की व्यवस्था थी , कदाचित आजकल से भी अधिक मात्रा में । सम्भवत : यह कहा जा सकता है कि इस काल के वर्तमान वैज्ञानिक यातायात के साधनों के अभाव में ऐसा होना ही था । इसी कारण से हमारे भारतीय ग्राम 19 वीं सदी के प्राय : मध्य तक अधिकांश में स्वतंत्र थे । सच पूछे , तो 19 वीं सदी के अन्त में , जब अपने देश में तार लग गये और रेलगाड़ियाँ चल पड़ी , हमारे भारतीय गाँवों की स्थानीय स्वतंत्रता पहली बार छीनी गई । विजयनगर - राज्य के ग्राम सभी स्थानीय बातों में परम स्वतंत्र थे । आजकल की पंचायतों की तरह इनकी अपनी - अपनी ग्राम - परिषदें हुआ करती थी । शासन - सम्बन्धी सारे कार्यों को यह परिषद करती थी । इस परिषद में ग्रामवासी ही शासक हुआ करते थे । गांववालों की अपनी कचहरी हुआ करती थी , जिसमें न्याय सम्बन्धी सारे काम सम्पादित किये जाते थे । पुलिस भी ग्रामवासियों की अपनी ही हुआ करती थी । यदि केन्द्रीय शासन को गाँवों से कोई सम्बन्ध था , तो बस इतना ही कि राजा का एक कर्मचारी प्रत्येक ग्राम में हुआ करता था , जो गाँव की सभी बातों पर अपनी दृष्टि रखता था । यह कर्मचारी महानायकाचार्य कहा जाता था । 

न्याय व्यवस्था : इस समय राजा सर्वेसर्वा था । प्रधान शासक तथा प्रधान सेनापति के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश भी वही था । पर , यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि चन्द महत्वपूर्ण मुकदमो को छोड़ अन्य मुकदमों के लिए उसे अवकाश ही नहीं रहता होगा । सभी प्रमुख स्थानों में न्यायाधीश नियुक्त किये जाते थे । न्याय संचालन में धार्मिक नियमों के अतिरिक्त सामाजिक प्रचलनों का बड़ा ध्यान रखा जाता था । 

अपराधियों को कठोर दण्ड दिया जाता था । साधारण अपराधों के लिए जुरमाने वसूल किये जाते थे । बड़े - बड़े अपराधों के लिए कई प्रकार की सजाएँ थीं , जो अपराधों के स्वरुप के आधार पर दी जाती थी । जायदाद जब्त कर लेना या मृत्यु दण्ड आदि की सजाएँ भी थीं । चोरी , पर - स्त्री - गमन , राजद्रोह आदि के लिए मृत्युदण्ड दिया जाता था । यही कारण था कि आजकल की तरह दिनों इन दुगुर्गों की भरमार नहीं थी । 

विजयनगर राज्य की अनेक बातें ऊपर की पंक्तियों में कही गई हैं । इससे हमें यह पता चलता है कि जिस प्रकार भारत में चन्द्रगुप्त , विक्रमादित्य , हर्ष , भोज आदि प्रतापी राजा हुए ; उसी प्रकार दक्षिण में विजयनगर राज्य का राजा कृष्णदेव राय हुआ । प्राय : 300 वर्षो तक इस राज्य की धाक दक्षिण भारत में रही । इसके बाद उसका पतन आरम्भ हुआ । इस पतन का कारण यह था कि विजयनगर के प्रान्तीय शासकों को बहुत अधिकार प्राप्त थे । जबतक केन्द्रीय शासन शक्तिशाली रहा , उनकी राजभक्ति अपने केन्द्रीय शासक या राजा के अति बनी रही , घर केन्द्र के कमजोर होते ही वह अपने - अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का स्वज देखने लगे । दूसरी बात यह थी कि विजयनगर - राज्य का उत्कर्ष अधिकांश में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार रित था । बौद्ध राजा इससे अनमनस्क गये । इससे विजयनगर राज्य को गहरा धक्का लगा । राज्य की आय कम पड़ गई और पूर्तगाल के बनिये भी भारत में आ चुके थे । इन विदेशी चतुर चापलूसों ने धीरे - धीरे बन्दरगाहों को अपने अधिकार मे करना शुरू कर दिया । राजा को कुछ न कुछ कीमत देकर इन्होंने अनेक बन्दरगाह अपने अधीन कर लिये । विजयनगर के राजे यदि दूरदर्शी होते , तो वह समझ पाते कि चन्द चाँदी के टुकड़ी के लिए वे कितनी बड़ी आफत को न्योता दे रहे है ।

एक तो बहमनी राज्य के साथ सनातन युद्ध में सम्मिलित होने के कारण विजयनगर राज्य की शक्ति सदा क्षीण होती ही रही , दूसरे उपर्युक्त भूलों के कारण कालान्तर में केन्द्रीय शासन कमजोर पड़ गया । इसका परिणाम हुआ कि वह राज्य छोटे - छोटे राज्यों में विभक्त हो गया ।

विजयनगर राज्य का पतन : बाद में इस वंश के अन्तिम शासक सदाशिव राय के समय सारी शक्ति उसके मंत्री राजाराम के हाथ में चली गई । वह बड़ा अत्याचारी था । उसने पड़ोस के मुसलमान राज्यों का एक संघ बनाकर विजयनगर पर आक्रमण किया । कृष्णा नदी के तट पर तालीकोट नामक स्थान पर भीषण संग्राम हुआ जिसमें सन् 1565 में विजयनगर की पूरी तरह पराजय हो गई । राजाराम मारा गया । मुसलमानों ने दिल खोलकर बदला लिया और विजयनगर को खूब लूटा । हिन्दूओं का कत्ल किया गया , नगर को नष्ट - भ्रष्ट किया । इसके बाद विजयनगर नहीं संभल सका । सन् 1570 में एक नये राज्य वंश की स्थापना हुई जो 1614 ई ० तक राज्य करता रहा । पर ये लोग विजयनगर को नष्ट होने से नहीं बचा सके । विजयनगर के उत्तरी भाग पर मुसलमानों ने अधिकार कर लिया तथा दक्षिणी भाग में मदुरा तथा तंजोर के नायकों ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया । 

विजयनगर राज्य के पतन के कई कारण थे । यह राज्य आरम्भ से ही बहमनी राज्य से संघर्षरत रहा । इससे दोनों को ही क्षति पहुँची । विजयनगर राज्य नष्ट ले नहीं हुआ पर हानि उसे पहुँचती ही रही । 

विजयनगर राज्य पुरानी युद्ध पद्धति को अपनाये हुए था तथा हाथियों पर भरोसा करता था । मुसलमानों के अश्वारोही एवं तीरंदाजों के सामने इनका ठहरना कठिन हो जाता था । मुसलमानों ने बारुद का प्रयोग भी करना आरम्भ किया , जिससे विजयनगर राज्य को पराजय स्वीकार करनी पड़ी । विजय प्राप्त होने पर कई हिन्दू राजाओं ने मुसलमानों पर बड़ा अत्याचार किया . जिसके प्रतिशोधस्वरुप मुस्लिम राज्य संगठित होकर विरोध में खड़े हो गये । तालीकोट में विजयनगर को इसी प्रकार के शक्ति संगठन ने पराजित किया था । 

अन्तिम राजा लोग अयोग्य थे तथा वे अपने प्रतिपतियों को नियंत्रण में नहीं रख सके । पुर्तगालियों ने , जो पश्चिमी समुद्र तट पर बस गये थे , भारतीय राजनीति में भाग लेना शुरु किया । ये सभी विजयनगर के लिए घातक सिद्ध हुए। 

सोलहवीं सदी के एक पुर्तगाली लेखक ने विजयनगर की प्रशंसा में लिखा है कि संसार भर में विजयनगर एक ऐसा शहर था . जहाँ प्रत्येक वस्तु उपलब्ध थी । सभी विदेश यात्री विजयनगर राज्य की प्रतिष्ठा और समृद्ध स्थिति देखकर अत्यन्त प्रभावित हुए थे । यहाँ के शासक साहित्य तथा कला के प्रेमी थे । उन्होंमे साहित्य और कला की उन्नति में बड़ा योगदान दिया । विजयनगर के राजाओं की भवन - निर्माण में बड़ी रुचि थी और अपनी राजधानी में उन्होंने बड़े सुन्दर भवनों का निर्माण करवाया था । बहुत से भव्य मन्दिरों का भी निर्माण करवाया था । इन भवनों तथा मन्दिरी पर बड़ी सुन्दर चित्रकारी की गई थी । इनमें से अधिकांश को मुसलमानों ने नष्ट कर दिया परन्तु जो बचे है वे उस काल की कला की उच्चता को प्रकट करते हैं । मुसलमानों के अत्याचारों को प्रतिक्रिया के फलस्वरुप इस विशाल राज्य की स्थापना हुई थी और स्थानीय भावनाओं के कारण ही इसका विकास भी हुआ था पर बाद में जब इसके शासकों ने भी अत्याचार किये तो मुस्लिम प्रतिक्रिया और उनके संगठन ने इस साम्राज्य की ईट से ईट बजा दी । यही , संक्षेप में विजयनगर के उत्थान तथा पतन की कहानी है ।


पढ़ने के लिए धन्यवाद

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