प्रश्न- फिरोजशाह के जीवन - चरित्र और उसकी उपलब्धियों का वर्णन करें

प्रश्न- फिरोजशाह के जीवन - चरित्र और उसकी उपलब्धियों का वर्णन करें

 

 B.A History VVI Question No 5 And Answer In Hindi 2021

दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में  B.a में आने वाला History का  Question no 5 का  आंसर Hindi देने वाले हैं। जिसको आपने पढ़ लिया तो आप अच्छे मार्क्स से पास हो जायेंगे।
B.A Part-1

Question And Answer

 प्रश्न-5  फिरोजशाह के जीवन - चरित्र और उसकी उपलब्धियों का वर्णन करें 

Ans . उसका जन्म तथा राज्यारोहण : मुहम्मद तुगलक की मृत्यु के बाद फिरोज शास तुगलक दिल्ली की गद्दी पर बैठा । उसका जन्म सन् 1309 ई ० में हुआ था । वह गयासुद्दीन का भतीजा और उसके छोटे भाई रजब का पुत्र था । उसकी माता भड़ी राजपूत कन्या थी । अपने पिता रणमल को बचाने के लिए ही उसने शादी की थी । जब फिरोज बड़ा हुआ तो उसने रण - विद्या और शासन - प्रबन्ध का प्रशिक्षण प्राप्त किया परन्तु उसने किसी भी क्षेत्र में निपुणता प्राप्त नहीं की । मुहम्मद तुगलक फिरोज को खूब मानता था । इसलिए उसने शासन प्रबन्ध में उसको अपने साथ ले लिया था । मुहम्मद तुगलक के बाद फिरोजशाह राजगद्दी पर बैठा । लेकिन उसने गद्दी को अनिच्छापूर्वक स्वीकार किया । राजमुकुट उसके सिर पर थोपा गया था । इसी बीच कुछ सरदारों ने स्वर्गीय सुल्तान का बेटा बताकर गद्दी पर बैठाने का आयोजन किया परन्तु ज्योहि फिरोज दिल्ली पहुंचा कि उनकी योजना समाप्त हो गई । इस तरह से फिरोज शाह तुगलक ने सैतिस वर्षों ( सन् 1351 से 1388 ई ० ) तक सफल रूप से शासन किया । 

उसका चरित्र उत्तम था । अबतक के दिल्ली के प्राय : सभी सुल्तान अपनी क्रूरता , अत्याचार और चरित्रहीनता के लिए बदनाम थे । लेकिन फिरोजशाह के साथ ऐसी बात नहीं थी । उसका शासन इस निन्दनीय परम्परा से अलग था । वह एक दयालु शासक था । वह एक पवित्र आचरण का व्यक्ति था । वह विजय के गौरव से अधिक शांति की दशा को पसंद करता था । प्रजा उसके शासन में खुश थी । अत : उसके शासनकाल में समस्त राज्य में सुख - शांति तथा समृद्धि थी । 

विजय तथा राजनीतिक घटनाएँ : उसके शासनकाल की निम्न घटनाएँ और विजय प्रमुख थी -

1. बंगाल : फिरोजशाह तुगलक ने बंगाल को दिल्ली में मिला लेने का प्रयास किया । उसने दो बार बंगाल पर इसी उद्देश्य से आक्रमण किया । परन्तु इस कार्य में सुल्तान असफल रहा । अन्त में सुल्तान ने सन् 1360 ई . में बंगाल के राजा के साथ एक शांति समझौता किया । फलतः बंगाल स्वतंत्र हो गया । अत : बंगाल का राजा सुल्तान के चंगुल से निकल गया । 

2. दक्षिण की स्वतंत्रता : दक्षिण में बहमनी का राज्य था । वहाँ राजा अत्यधिक कुशल था । जब बहमनी राज्य का राजदूत फिरोज शाह के दरबार में गया तो सुल्तान ने उसका स्वागत कर उसको अपने दरबार में स्थान दे दिया । सुल्तान ने दक्षिण के राज्यों की स्वतंत्रता को अप्रत्यक्ष रूप से दे दिया ।

3. सिन्ध पर विजय : इसके बाद सुल्तान फिरोजशाह का ध्यान सिन्ध की ओर गया । सुल्तान ठट्ठा फिर से जीतना चाहता था । इसी उद्देश्य से सुल्तान ने एक विशाल सेना के साथ आक्रमण किया । घमासान युद्ध के बाद भी सुल्तान को वहाँ पर सफलता नहीं मिली । इस तरह से सुल्तान का पहला आक्रमण निष्फल रहा । इसके बाद सुल्तान ने पूरी तैयारी के साथ पुनः सिन्ध पर आक्रमण किया । सुल्तान की सेना बहुत दिनों तक ठट्ठा को घेरे रही और वहाँ के राजा को भूखे मार डाला । यह विजय उसके शासनकाल की एक प्रमुख घटना थी क्योंकि सुल्तान की यही एकमात्र विजय थी । इस विजय का कोई भी परिणाम न निकला । सुल्तान सिन्ध को अपने सामाज्य में नहीं मिला सका । उसने वहाँ से राजा जाम के एक सम्बन्धी को वहाँ का शासक बना दिया । 

4. शासन प्रवन्ध : फिरोज शाह का शासन प्रबन्ध उत्तम था । उसका शासन मानवीय , उदार और प्रगतिशील था । सुल्तान ने पुराने कठोर नियमों को दूर करने का प्रयत्न किया । उसने सर्वप्रथम यह काम किया कि उसके भाई के द्वारा सताये गये लोगों का पता लगाया और उन सबों को हरजाना देकर संतुष्ट करने का प्रयास किया । 

उसके सुधार निम्न प्रकार हैं -

1. इसके बाद उसने कृषि में सुधार लाने की कोशिश की । मुहम्मद तुगलक के शासन काल में खेती एकदम बर्बाद हो गयी थी । किसानों को खेती से पेट नहीं भरता था । फिर किसानों पर बहुत से कर लगाये गये थे । फिरोज शाह ने कृषकों पर से टैक्स हटा दिया । केवल सरकारी कर ही किसानों से लिया जाने लगा । किसानों से बलजोरी कर वसूल करने वालों को कड़ी सजा दी जाती थी । इस तरह से प्रजा की तबाही का अन्त हो गया । बेकार जमीनों को खेती के योग्य बनाया गया । सिंचाई के साधनों को उन्नत किया गया । इस तरह से खेती की दशा में काफी सुधार आ गया । उसने दण्ड की प्रथा में भी सुधार किया । दण्ड में अंग - भंग और पीड़ा पहुँचाने की सजा को बन्द कर दिया । उसने फौजदारी कानून को भी नरम कर दिया । इस तरह से सुल्तान ने अपनी प्रजा की भलाई हेतु बहुतेरे ऐसे कार्य किए । वास्तव में उसके शासनकाल में प्रजा बहुत खुश और संतुष्ट थी । 

2. अपने सैनिक अधिकारियों को नकद वेतन देने के बदले उसने मालगुजारी सहित जागीर देने की प्रथा को पुन : प्रचलित किया । कर्मचारियों को जागीर देने की प्रथा को अलाउद्दीन ने उठा दिया था . क्योकि वह समझता था कि इसी से सब विद्रोह होता है । इस प्रथा के पुनः लागू हो जाने से राज्य के नागरिकों को राहत मिली । 

3. फिरोज शाह ने भी बहुत से निर्माण कार्य किये । निर्माणकारी कार्यों में उसको बहुत मन लगता था । वह अपने निर्माण के लिए ही अधिक प्रसिद्ध है । उसके बनवाये हुए नगर , मस्जिदें , मदरसे , अस्पताल , नहर और बाँध अभी तक फिरोज शाह तुगलक के नाम को रौशन कर रहे हैं । उसने दिल्ली में अपनी नई राजधानी का निर्माण कराया । इसको उसने एक नयी नवेली दुल्हन की तरह सजाया और इसका नाम उसने अपने नाम पर फिरोजाबाद रखा । 

4. इसके बाद उसने फतेहाबाद , जौनपुर और हिसार - फिरोजा आदि कई नगर भी बसाये । इन नगरों से देश को बहुत लाभ हुआ । हिसार - फिरोज नगर में पानी पहुंचाने के लिए उसने यमुना और सतलज नदी में दो नहरें खुदवायीं । पुरानी यमुना नहर आज भा वर्तमान है । इसी से पंजाब के एक बड़े भाग में सिंचाई आज भी होती है । फिरोज शाह पुराने - पुराने भवनों को भी बराबर मरम्मत करवाता था ।

5. फिरोज शाह ने दास प्रथा को भी एक संगठित रूप दिया । उसने अपने सैनिक पदाधिकारियों को यह आज्ञा दी कि अधिक - से - अधिक युद्ध - बंदियों को दास बनाया जाय और उनमें से चुने हुए दासों को सेवा के लिए दिल्ली भेजा गया । सुल्तान ने इन दासों को शिक्षित करने की भी व्यवस्था की । इन्हीं दासों से सुल्तान अंगरक्षकों , सैनिक और कारीगरों का काम लेता था । वह युद्ध - बन्दियों की हत्या करना नहीं चहता था । उसकी इस व्यवस्था से शत्रुओं को भी इस्लाम धर्म में दीक्षित होना पड़ता था । 

6. उसकी धार्मिक असहिष्णुता ने उसको बदनाम कर दिया । फिरोजशाह तुगलक एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था । इसलिए वह शियाओं और हिन्दुओं के रीति - रिवाजों के प्रति पूर्णरूपेण असहिष्णु था । उसने शिया लोगों की धार्मिक पुस्तकों को आग में जला दिया और उनके धर्म प्रचार पर नियंत्रण लगा दिया । उसने हिन्दुओं पर होनेवाले दुर्व्यवहार को बन्द कर दिया । परन्तु हिन्दुओं की मूर्ति पूजा और चित्र बनाने पर रोक लगा दी गई । एक ब्राह्मण को तो उसने जीवित जलवा दिया क्योंकि वह खुलेआम संध्या - पूजन किया करता था । ब्राह्मणों पर उसने नये ढंग से जजिया कर लगा दिया । उसने हिन्दुओं को नया मन्दिर बनाने की आज्ञा नहीं दी । जो हिन्दू मुसलमान बने थे उनपर जजिया कर नहीं लगाया था । वह पक्का इस्लामी था । अत : उसको धर्मान्ध कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है। 

उसके सम्बन्ध में स्मिथ का यह कथन कि – ' उसने पूर्ववर्ती आक्रमणकारियों की जंगली परम्परा को कायम रखा , अनुचित है । इस मामले में फिरोज यूरोप और एशिया के अपने समकालीन राजाओं से बुरा न था बल्कि उनमें से बहुतों से उसका स्तर ऊँचा था । ' 

7. फिरोज शाह अबतक वृद्ध हो चुका था । उसने सारा राजकार्य अपने मंत्रियों के ऊपर छोड़ दिया परन्तु उसका यह कार्य सफल न हुआ । जिस तरह से उसके पुत्र उसके कार्यों को संभाल न सके थे ठीक उसी तरह से उसके मंत्रीगण भी उसके कार्यों को संभाल न सके । राजकार्य की चिन्ता उसको हमेशा बनी रही । इस तरह से सन् 1388 ई . में उसका देहान्त हो गया । प्रजा उसकी मृत्यु से बहुत दुखी हुई मानो उनको अपने सुल्तान की याद सताती हो । अत : फिरोज शाह तुगलक एक प्रजा सेवी सुल्तान था । उसने प्रजा के हित के लिए अनेक कार्य किये । 

मूल्यांकन : फिरोज शाह अपनी प्रजा के लिए सबसे अच्छा शासक था । उसका शासन उदार , नरम , मानवीय और प्रगतिशील था । उसने समुचित ढंग से शासन का प्रबन्ध किया । जिसके फलस्वरुप प्रजा सुख - शांति से जीवन - यापन करने लगी । जनता उसके शासन में सुख की नींद सोती थी । उसने बेगारी प्रथा को बन्द कर दिया । उसने जनता पर से करों का बोझ हटाया । सबों को सिंचाई की सुविधा प्रदान की । उसने सार्वजनिक निर्माण कार्यों को बहुत आगे बढ़ाया । वह निश्चित रूप से अन्य धर्मावलम्बियों के प्रति असहिष्णु था । परन्तु वह अपने समकालीन एशिया और यूरोप के शासकों से खराब नहीं था । 

वह एक उत्तम शासक था परन्तु एक कुशल सेनापति नहीं था । उन दिनों की परिस्थिति ऐसी थी कि एक कुशल सेनापति का होना अवश्यक था । बंगाल पर उसने दो बार आक्रमण किया परन्तु इसका कोई अच्छा परिणाम न निकला । उसके दोनों आक्रमण निष्फल गये । उनका प्रभाव नगन्य ही रहा । उसने दक्खिन को जीतने की कोई कोशिश न की । सैनिक सफलता में उसकी अधिक रुचि नहीं थी । शिकार खेलने का वह बड़ा शौकिन था । इतिहास के अध्ययन में भी उसको विशेष प्रेम था । इमारतों के निर्माण में उसको विशेष आनन्द मिलता था । 

परन्तु उसका कोई भी कार्य एक राजनीतिज्ञ का नहीं था । उसने अपने सैनिक कर्मचारियों को नकद वेतन न देकर जागीर देना शुरु किया । उसके देहान्त के बाद राजधानी में अराजकता फैली जिसका प्रमुख कारण उसकी सैनिक व्यवस्था ही थी । फलतः दिल्ली साम्राज्य में विश्रृंखलता फैल गई ।

जागीर देने से जागीरदारों में पुस्तैनी ताकत आ जाती थी । जिसके बल पर जागीरदार लोग स्वतंत्र होने की चेष्टा किया करते थे । अत : उसकी गलती उसके कमजोर उत्तराधिकारियों के शासनकाल में बड़ी घातक सिद्ध हुई । इस तरह से स्पष्ट है कि फिरोजशाह तुगलक एक योग्य शासक तथा माहिर पलन्धक और कुशल प्रजा - सेवी शासक था । वह वास्तव में एक न्यायमूर्ति था । उसके शासनकाल में प्रजा को सुख - सुविधा प्राप्त थी । उसके राज्य में सर्वत्र शांति और सुव्यवस्था विराजमान थी । अत : वह एक प्रजा हितैषी शासक था ।

पढ़ने के लिए धन्यवाद

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