प्रश्न- मुहम्मद - बिन - तुगलक के चरित्र और उसके कार्यों का मूल्यांकन करें ।

प्रश्न- मुहम्मद - बिन - तुगलक के चरित्र और उसके कार्यों का मूल्यांकन करें ।

 

B.A History VVI Question No 7 And Answer In Hindi 2021


दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में  B.a में आने वाला History का  Question no 7 का  आंसर Hindi देने वाले हैं। जिसको आपने पढ़ लिया तो आप अच्छे मार्क्स से पास हो जायेंगे।

B.A Part-1

Question And Answer

प्रश्न- 7 मुहम्मद - बिन - तुगलक के चरित्र और उसके कार्यों का मूल्यांकन करें ।

Ans . इतिहासकारों में मुहम्मद तुगलक के चरित्र और उसके कार्यों के संबंध में बहुत विवाद है । ऐलिफिस्टन के शब्दों में- " मुहम्मद तुगलक पर थोड़ा बहुत पागलपन का प्रभाव था । " हेबेल , टामस और स्मिथ ने भी उसके विचारों का समर्थन किया है । बाउन ने मुहम्मद तुगलक को पागल , खूनी , स्वण देखनेवाला और सनकी नहीं माना है । बरनी और इब्नबतूता मुहम्मद तुगलक के व्यक्तित्व से गुण और दोषों के विषय में विपरीत मत रखते हैं । इस तरह का विवाद हमेशा से चला आ रहा है । 

मुहम्मद तुगलक एक योग्य तथा कुशल शासक था । वह उच्चकोटि का विद्वान था । उसके कार्यों की समकालीन लोगों ने प्रशंसा की है । उसकी बुद्धि तीक्ष्ण थी । उसकी स्मरणशक्ति तीन थी । वह तर्कशास्त्र , गणितशास्त्र , ज्योतिषशास्त्र और भौतिकाशास्त्र का ज्ञाता था । उसे फारसी कविता का अच्छा ज्ञान प्राप्त था । उसे पत्रों में फारसी कविता लिखने में बहुत आनन्द आता था । उसे औषधियों का भी ज्ञान प्राप्त था । इस तरह से वह कुशल वैद्य था । वाद - विवाद में वह माहिर था । उपमाओं और अलंकारों के प्रयोग में वह दक्ष था । उसका स्वभाव उदार था । उसकी आदतें साधारण थी । वह प्रचलित सामाजिक बुराईयों से बहुत दूर था । इब्नबतूता के मतानुसार - ' ' वह सबसे ज्यादा नम्र मनुष्य और एक ऐसा मनुष्य था जो सदा ठीक व सच्चे काम को करने के लिए तत्पर या उत्सुक रहता था । " 

कुछ इतिहासकारों के अनुसार वह धार्मिक व्यक्ति न था । वह पवित्र तथा योग्य मनुष्यों के हत्याकांड के लिए भी उत्तरदायी था । इब्नबतूता के शब्दों में- " मुहम्मद तुगलक निष्ठा के साथ धार्मिक सिद्धान्तो का अनुसरण करने वाला था , वह स्वयं प्रार्थना करता था और उन मनुष्यों को दंड देता जो पूजा पाठ से उदासीन रहा करते थे । " 

उसकी कल्पना शक्ति बहुत तीव्र थी परन्तु उसके पास व्यावहारिक न्याय और सामान्य बुद्धि का अभाव था । उसका स्वभाव गरम था । वह प्रत्येक काम को बहुत तेजी से करता था । वह किसी का विरोध नहीं सहता था । विरोधियों को तो वह देखना नहीं चाहता था । वह अपने विरोधियों को कड़ा से कड़ा दण्ड दिया करता था । बरनी के शब्दों में- " उसने जो कुछ सोचा , अच्छा सोचा , परन्तु अपनी योजना को लागू करने में उसने अपने प्रदेशों को भी खो दिया । उसने अपनी जनता को असन्तुष्ट कर दिया और अपना कोष रिक्त कर दिया । विस्मय के बाद विस्मय आया । इसलिए गड़बड़ी चरम सीमा पर पहुंच गई । फलत : उसके सैनिक और सेवक तितर - बितर हो गये । सुल्तान के मस्तिष्क का संतुलन भी खत्म हो गया और अन्त में वह अपनी प्रजा के प्रति और भी राष्ट हो गया । 

एक दिन मुहम्मद तुगलक ने बरनी महोदय से यह कहा था कि- " मेरा राज्य रोगी है और कोई भी औषधि इसे अच्छा नहीं कर सकती है । वैद्य सिर का दर्द अच्छा करता है तब ज्वर आ जाता है और ज्वर ठीक करता है तो अन्य रोग उभर आता है । इसलिए मेरे राज्य में अशान्ति फूट पड़ी है । यदि इसे मैं एक स्थान पर दबाता हूँ तो दूसरे स्थान पर उठ जाती है । उसे एक जिले में रोकता हूँ तो दूसरे जिले में गड़बड़ हो जाती है । बड़े अपराधों के लिए छोटा दण्ड देता हूँ तो छोटे - छोटे अपराधों के लिए मृत्यु दण्ड दे देता हूँ । ' 

विद्वानों ने मुहम्मद बिन तुगलक को ' विपरीतताओं का मिश्रण ' भी कहा है । उसमें ग भी था । वह दरबार में आनेवालों को उपहार देता था तो अत्याचारियों को मृत्यु दण्ड भी देता के साथ - साथ कुछ दोष भी थे । वह जहाँ उदार , विनम्र और दयालु था वहाँ कूर और कठोर था । सुल्तान का स्वभाव ऐसा था कि कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता था कि वह को क्या देगा ? ऐसे व्यक्तियों को वह दान और फांसी दोनों में से कुछ भी दे सकता था ।
वह लोगों की भावनाओं की चिन्ता नहीं करता था । ऐसा इसलिए होता था कि वह अपने मस्तिष्क का संतुलन खो बैठा था । 

मुहम्मद तुगलक में प्रतिकूलताओं का भी विचित्र मिश्रण था । डॉ ईश्वरी प्रसाद के मतानुसार उसे खून का प्यासा होना और पागल होने का दोष देना निराधार है । अत : मुहम्मद तुगलक विक्षिप्त या पागल नहीं था । धार्मिक वर्ग के लोगों ने ही उस पर खून का प्यासा होने का दोष लगाया है । 

परन्तु ब्राउन के अनुसार , " वह पागल था । यह ऐसा विचार है कि जिसका समकालीन लोग कोई संकेत नहीं देते है । वह एक स्वप्न - दर्शन भी था । उसका बहुरुपी , व्यावहारिक और तेजपूर्ण चरित्र हमें ऐसा विश्वास करने से रोकता है । " लेनपूल के अनुसार- “ मुहम्मद तुगलक मध्य युग का सबसे अधिक विलक्षण जीव था । वह ऐसा व्यक्ति था जिसका विचार अपने समय से बहुत आगे था । वह अपनी योजनाओं में अधिक साहसी था । वह कविता का तीक्ष्ण विद्यार्थी था । वह भारतीय शिक्षा की लातीनी शैली का उस्ताद था । यूनानी तर्कशास्त्र और वेदान्त शास्त्र में उसे प्रशिक्षण प्राप्त था । विद्वान् उससे विवाद करते हुए डरते थे । गणित और विज्ञान का भी वह प्रेमी था । अत : वह उन सब विषयों में पूर्ण निपुण था जो उस युग और उस देश में संस्कृति द्वारा प्राप्त हो सकता था । 

" बुल्जले हेग के शब्दों में- “ मुहम्मद तुगलक जैसे विषम और प्रतिकूल चरित्र को अकित करना कोई सुगम कार्य नही है । वह उन असाधारण राजाओं में से एक था जो कभी भी गद्दी पर बैठ सके । उसने अपनी बहु आयामी उदारता में क्रान्तिमयी और निर्भेद , निर्दयता का संयोग कर दिया । उसने इस्लाम में कानून द्वारा निर्धारित रीति और संस्कार को सभी सार्वजनिक विषयों से पूर्णरुपेण पृथक कर दिया । " बरनी ने यह लिखा है कि- " सुल्तान का गर्व इतना अपरिमित था कि वह यह सुनना सहन नहीं कर सकता था कि इस पृथ्वी का कोई भी कोना , यहाँ तक कि आकाश का कोई भी कोना उसकी सत्ता के अधीन नहीं है । अत : एक ही समय में वह सुलेमान और सिकन्दर दोनों ही था । वह सिर्फ राजपद से ही संतुष्ट नहीं था क्योंकि वह धार्मिक पुरोहित का पद प्राप्त करने का भी इच्छुक था । उसकी यह आकांक्षा थी कि संसार की सब वस्तुओं को वह अपना दास बना ले । " अतः मुहम्मद तुगलक एक महान शासक , कुशल विजेता और सफल प्रबन्धक था ।

(पढ़ने के लिए धन्यवाद)

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