B.A History VVI Question No 8 And Answer In Hindi 2021


दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में  B.a में आने वाला History का  Question no 8 का  आंसर Hindi देने वाले हैं। जिसको आपने पढ़ लिया तो आप अच्छे मार्क्स से पास हो जायेंगे।


B.A Part-1

Question And Answer
 

प्रश्न -8 हर्षवर्द्धन का मूल्यांकन करें ।
या, हर्ष के साम्राज्य विस्तार को इंगित कीजिए

Ans . गुप्त साम्राज्य के छिन्न - भिन्न हो जाने के उपरान्त भारत की राजनीतिक एकता एक बार फिर समाप्त हो गई और देश के विभिन्न भागों में फिर छोटे - छोटे राजवंशों की स्थापना की गई जिनमें निरन्तर संघर्ष चलता रहता था । देश में कोई ऐसी प्रबल शक्ति न थी जो देश की रक्षा कर सकती और इन छोटे राज्यों पर नियंत्रण रख कर देश को सुख तथा शांति प्रदान कर सकती । जिस समय हूणों के आक्रमण हो रहे थे और गुप्त साम्राज्य छिन्न - भिन्न हो रहा था उन्हीं दिनों छठी शताब्दी के आरम्भ में थानेश्वर में एक नये राजवंश की स्थापना हुई । इस वंश का संस्थापक पुण्यभूति था जो शिव का परम भक्त था । प्रभाकर वर्धन इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था , जिसने परम भट्टारक तथा महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण की । 605 ई ० में प्रभाकर वर्धन की मृत्यु पर हर्षवर्धन का बड़ा भाई राज्यवर्धन गद्दी पर बैठा । हर्ष की बहन राजश्री का विवाह कन्नौज के मौखरी राजा ग्रहवर्धन के साथ हुआ था । राज्यवर्धन के गद्दी पर बैठते ही सूचना मिली की मालवा नरेश देवगुप्त तथा गौड़ ( बंगाल ) के शशांक ने कन्नौज पर आक्रमण कर ग्रहवर्धन को पराजित कर मार डाला है तथा राजश्री को कैद कर लिया है । राज्य वर्धन ने तत्काल अपनी बहन के सहायतार्थ कूच किया । उसे मालवा नरेश के विरुद्ध तो सफलता मिली पर शशांक के विश्वासघात द्वारा वह मार डाला गया । इन परिस्थितियों में अपनी इच्छा के विरुद्ध हर्षवर्धन को राजगद्दी स्वीकार करनी पड़ी । सन् 606 में गद्दी पर बैठते ही हर्ष ने अपनी बहन की तथा बड़े भाई का बदला लेने के लिए अभियान किया । उसने अपनी बहन की रक्षा की तथा फिर कन्नौज पर अधिकार कर लिया । कन्नौज का उत्तराधिकारी कोई नहीं था । इससे अपनी बहन तथा कन्नौज की प्रजा के आग्रह पर थानेश्वर के साथ ही उसने कन्नौज की राजगद्दी स्वीकार कर ली । हर्ष ने कन्नौज को ही अपनी राजधानी बना लिया । शीघ्र ही उसने अपनी शक्ति को बढ़ा लिया और एक विशाल सेना की सहायता से दिग्विजय कर फिर भारत की राजनीतिक एकता को स्थापित करने का निश्चय किया । उसने अपनी महत्वाकांक्षा को प्रकट करते हुए घोषित किया कि " कुछ दिनों के भीतर यदि ..... उदंड राजाओं के पांवों में बेड़ियों की झंकार से पृथ्वी को प्रतिध्वनित न कर दूंगा तो पतंग को भाँति अपने को जलती हुई अग्नि में झोंक दूंगा । " 

सबसे पहले उसने अपने पारिवारिक शत्रु बंगाल के शासक शशांक पर विशाल सेना के साथ आक्रमण किया पर सफलता प्राप्त नहीं हुई । बाद में उसने कामरूप ( आसाम ) के शासक भास्कर वर्मन से मित्रता कर ली तथा दोनों ने मिलकर शशांक पर आक्रमण कर उसे पराजित किया । शशांक पराजित तो हो गया पर उसके उपरांत भी हर्ष को परेशान करता रहा । हर्ष ने उत्तर भारत के विभिन छोटे - छोटे राज्यों को पराजित करके समस्त उत्तर भारत को अपनी अधीनता में ले लिया । 

इस समय सौराष्ट्र में जिसकी राजधानी बल्लभी थी , मैत्रकवंशीय धुवसेन द्वितीय शासन कर रहा था । हर्ष ने बल्लभी पर आक्रमण कर उसे युद्ध में परास्त किया परन्तु उस राज्य के सैनिक महत्व को ध्यान में रखते हुए उसने ध्रुवसेन को अपना मित्र बनाकर अपनी कन्या का विवाह उससे कर दिया । धूवसेन ने हर्ष की अधीनता स्वीकार कर ली तथा सामंत के रूप में राज्य करने लगा ।

महाराष्ट्र के चातुक्यवंशीय पुलकेशिन द्वितीय पर भी उसने आक्रमण किया । किन पुलकेशिन बड़ा ही शक्तिशाली शासक था । इस युद्ध में जो , 620 ई . में हुआ . पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को पराजित किया और हर्ष निराश होकर लौट गया और नर्मदा उसके राज्य की सीमा हो गई । इसके बाद हर्ष उत्तर भारत में तथा पुलकेशिन दक्षिण भारत में अपनी शक्ति बढ़ाते रहे, पर आपस में नहीं लड़े । नर्मदा उनके राज्यों की सीमा बनी रही । 

उपयुक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि हर्ष का साम्राज्य व्यापक था । हाँ के सामान्य  ,के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है । इर्ष का सामाज्य उत्तर में हिमालय पर्वत से कर में नर्मदा नदी के तट तक और पूर्व में आसाम से पश्चिम में सौराष्ट्र तक फैला था । पान सम्पूर्ण प्रदेश में उसका प्रत्यक्ष शासन नहीं था । कुछ भाग में वह स्वयं शासन करता था और शेष में उसके सामंत शासन करते थे । कुछ इतिहासकारों का कहना है कि हर्ष ने पाल , मिल और कश्मीर राज्यों को भी जीता था । 

हर्ष एक महान् विजेता ही नहीं वरन् एक कुशल शासक भी था । उसने थोड़े से परिवर्तनी के साथ गुप्तकालीन शासन व्यवस्था का भी अनुसरण किया था । एक शासक के रूप में यह कहा जा सकता है कि उसका शासन बड़ा ही उदार , दयालु तथा प्रजा हितकारी था । उसने प्रजा के करों का भार हल्का कर दिया ताकि प्रजा को कष्ट न हो तथा उनकी आर्थिक दशा अच्छी रहे । देश में शांति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए उसने दंड विधान को कठोर बना दिया । अपराधों की संख्या कम हो गई तथा प्रजा शांति से रहने लगी । हर्ष अपनी प्रजा के सुख का ध्यान रखता तथा राज्य में प्रजा को कठिनाईयों का पता लगाता और उन्हें दूर करता था । उसने अनेक लोक - मंगलकारी कार्य किये जिससे उसकी प्रजा बड़ी ही सुखी और सम्पन्न हो गई । हर्ष हदय से कोमल तथा दयालु तो था ही उसमें धर्मपरायणता भी बड़ी उच्चकोटि की थी । आरम्भ में वह ब्राह्मण धर्म का अनुयायी तथा शिव , सूर्य आदि की उपासना करता था । बाद में वह बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया । परन्तु धर्म परिवर्तन से उसके धार्मिक विचारों में किसी भी प्रकार की संकीर्णता नहीं आयी थी । उसमें उच्चकोटि की धार्मिक वृत्ति थी और सभी धर्म वाला को वह आदर तथा श्रद्धा की दृष्टि से देखता था । वह सभी सम्प्रदाय के साधु - सन्यासियों का आदर करता था तथा कर्ण को भी लज्जित करनेवाले अपने दान से सभी को संतुष्ट रखता था । 

हर्ष महान् साहित्यानुरागी था । वह स्वयं एक उच्चकोटि का विद्वान तथा लेखक था । उसने ' नागानन्द ' , ' रत्नावली ' तथा ' प्रियदर्शिका ' नामक तीन ग्रन्थों की रचना की । उसके दरबार में विद्वानों तथा लेखकों को आश्रय मिलता था । वाणभट्ट जो हर्ष - चरित्र ' तथा कादम्बरी ' का रचयिता है , उसी के दरबार में रहता था । शिक्षा प्रचार में भी हर्ष ने बड़ी रुचि ली थी । उसने अनेक शिक्षा संस्थाओं की सहायता की एवं कई की स्थापना करवाई हर्ष ने नालन्दा विश्वविद्यालय की सहायता के लिए 220 गांवों की आय प्रदान की । हर्ष ने अपनी प्रजा के केवल भौतिक सुख तथा आध्यात्मिक विकास के लिये ही नहीं वरन् बौद्धिक विकास के लिए भी सुविधाएँ प्रदान की । 

हर्ष ने भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के पोषण तथा प्रचार का भी अथक प्रयास किया । तिब्बत , चीन तथा मध्य एशिया के साथ इस काल में भारत का बड़ा घनिष्ठ सांस्कृतिक सम्बन्ध स्थापित हो गया और इन देशों में भारतीय संस्कृति का खूब प्रचार हुआ । दक्षिण - पूर्व एशिया के द्वीप समूहों में भी भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हुआ । इस दृष्टिकोण से हर्ष का शासनकाल बड़ा गौरवपूर्ण था । इन सब बातों के कारण ही हर्ष को भारतीय इतिहास लेखकों ने बहुत अधिक महत्व दिया है । प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ ० राधा मुकूद मुखर्जी के अनुसार हर्ष के चरित्र में चन्द्रगुप्त तथा अशोक दोनों के गुणों का समन्वय है । 

यह सत्य है कि हर्ष ने एक छोटे राज्य की कठिनाइयों से घिरा हुआ पाया और अपन दिग्विजय द्वारा एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की । गुप्त सामाज्य के छिन्न - भिन्न हो जान पर भारत की राजनीतिक एकता समाप्त हो गई थी , उसे उसने फिर अपने बाहुबल से स्थापित किया । उसकी गणना भारत के महान् विजेताओं तथा साम्राज्य निर्माताओं में की जा सकती है किन्तु महाप्रतापी विजेता समुद्रगुप्त से उसकी तुलना करना एक प्रकार से समुद्रगुप्त का अपमान करना है जहाँ समुद्रगुप्त ने समस्त भारत को विजय करके समुद्र पर्यन्त राज्य की स्थापना की तथा जिसे कभी पराजय का सामना नहीं करना पड़ा था , हर्ष के राज्य की सीमा केवल नर्मदा तक थी । उसने कामरूप के शासक से मित्रता स्थापित की , फिर भी वह अपने कुल - शत्रु शशांक को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका । पुलकेशिन द्वितीय के हाथों से तो उसे खुली पराजय स्वीकार करनी पड़ी जिसके परिणामस्वरुप उसने दक्षिण विजय का विचार ही त्याग दिया था । हाँ , विद्या - प्रेमी एवं विद्वानों का आदर करने में दोनों सरस्वती के वरद पुत्र तथा सरस्वती के अनन्य उपासक थे । 

प्रजा हितकारी शासन , धार्मिक सहिष्णुता , विभिन्न धर्मों में समन्वय , भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का विदेशों में प्रचार , बौद्ध धर्म का प्रचार आदि में हर्ष की तुलना केवल अशोक से की जा सकती है । आर ० सी ० मजमुदार ने उसे हिन्दू काल का अकबर का है । डॉ ० राय चौधरी ने अधिक उपयुक्त लिखा है कि हर्ष एक महान सेना नायक तथा न्यायी शासक तो था ही , पर इससे भी बढ़कर वह धर्म तथा साहित्य का संरक्षक था ।

पढ़ने के लिए धन्यवाद