B.A History VVI Question No 2 And Answer In Hindi 2021

दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में  B.a में आने वाला history का question 2 का आंसर देने वाले हैं। जिसको आपने पढ़ लिया तो आप अच्छे मार्क्स से पास हो जायेंगे।

(B.A Part -1)

Question and Answer

Q.2 . महावीर स्वामी के जीवन चरित्र तथा उपदेशों का वर्णन करें ।

Ans . जैन धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी थे । परन्तु जैन अनुश्रुतियों के अनुसार जैन धर्म अत्यधिक पुराना है और महावीर स्वामी के पहले भी इस धर्म के 23 तीर्थकर हो चुके  थे । महावीर स्वामी तो इस धर्म के 24 वें तीर्थकर थे जिन्होंने जैन धर्म की बहुत अधिक सेवा की । इसके 24 तीर्थकरो के नाम क्रमशः इस प्रकार है - ऋषभ , अजितनाथ , शंभुनाथ , अभिनन्दननाथ , सुमितनाथ , सुपादूमनाथ , सुपाश्वनाथ , बन्दाप्रभु , पुष्पधर , शीतलनाथ , श्रेयांसनाथ , बसूपुज्य , विमलनाथ , अनन्त नाच , धर्मनाथ , नण्डी , कुण्डू , अवनाथ , ल्लीनाथ , मुनि सुबतनाथ , निमिनाथ और वर्धमान महावीर स्वामी ।

महावीर स्वामी का जीवन परिचय : महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 ई ० वर्ष पूर्व वैशाली के निकट उत्तरी बिहार के वर्तमान वैशाली जिले में स्थित कुण्डग्राम में हुआ था । उनका बचपन का नाम वर्धमान था । उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था जो वृज्जि राज्यसंघ के भीतर क्षाविक कुल के प्रधान थे । उनकी माता त्रिशुला थी जो वैशाली के राजा चेतक की बहन थी । चेतन की पुत्री चेल्हना की शादी मगध के राजा विम्बिसार के साथ हुई थी । अत : महावीर का संबंध कई शक्तिशाली राजवंशों के साथ था । फलतः ये भी शक्तिशाली बन गये थे । सिद्धार्थ और निशुला को केवल तीन संताने हुई जिनमें एक कन्या और दो पुत्र थे । सिद्धार्थ के बड़े लड़के के बारे में कोई अधिक जानकारी प्राप्त नहीं होती है लेकिन उनके छोटे पुन का नाम वर्धमान था । जो आगे चलकर महावीर के नाम से प्रसिद्ध हुए । इनको वीर , महावीर , जिन , अति और भागवत आदि अनेक नामों से भी जाना जाता है ।

वर्धमान का बचपन का जीवन बड़े ही लाइ - प्यार से राजकुमारों की भांति व्यतीत हुआ । छोटी उम से ही वह पढ़ने लिखने लग गये थे । उन्हें हर विषय की शिक्षा दी गई थी । थोड़े से दिनों में वह सभी तरह की विद्याओं और शिल्पों में माहिर हो गये थे । उसका विवाह यशोधरा नामक राजकुमारी के साथ हुआ था । जिससे एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी जिसकी शादी महावीर के एक शिष्य जामवलि के साथ की गयी थी ।

महावीर गृह - जीवन में वो नहीं रह सके । गृहस्थाश्रम में उन्हें मन नहीं लगा उन्होंने संन्यास लेने का निशय कर लिया । वे ' प्रेम ' मार्ग को छोड़कर श्रेय मार्ग की ओर जाना चाहते थे । इसी बीच उनके पिता की मृत्यु हो गयी । इसके बाद वे 30 वर्ष की उम्र में ही घर - बार छोड़कर संन्यासी बन गये । उनके परिवार के सभी लोग पहले से ही जैन धर्म के अनुयायो थे । फलतः ये भी जैन भिक्षु बन गये थे । जो वस्त्र घर से पहनकर निकले थे उसी को ये 13 महीने तक पहनते रहे । जब वह वस फटकर शरीर से गिर गया तबसे वे नंगे रहने लगे थे । इसी दशा में यह सत्य की खोज में इधर - उधर भटकते रहे । अब ये अत्यन्त कठोर तपस्या , शारीरिक - यन्वणा और आत्महनन में विश्वास करने लगे । 12 वर्ष तक उन्होंने इतनी कठिन तपस्या की कि उनका शरीर सूखकर कांटा हो गया था । धार्मिक काव्य आचारांग सूत्र में महावीर की कठिन साधना का बड़े ही मार्मिक ढंग से वर्णन किया गया है जो निम्नलिखित है- " वे नंगे और गृहविहीन होकर भ्रमण करने लगे । लड़के - बच्चे उन्हें पागल समझकर मारते और चिदाते भी थे । पर वे बिना किसी बात की चिन्ता किये अपने कार्य तथा भुन में लगे रहे । लाद नामक जगह पर तो उन्हें लोगों ने वापी पीटा और उनके पीछे कुत्ता भी छोड़ दिया था । लोग उनका सात से भी स्वागत करने में नहीं हिचकते थे । लड़के सब मिट्टी के टेले तथा झिटके फैक - फेक मारते थे । लेकिन महावीर इन सब बातों को सहन करते गये । लोग उनकी तपस्या को भंग करना चाहते थे पर उनकी तपस्या भंग न हुई । चोट लगने के फलस्वरुप उनका शरीर खून से लथपथ हो जाने पर भी वे कभी चिकित्सक यहाँ नहीं गये , वे कभी औषधी नहीं खाते थे , ये कभी हाथ - मुँह न धोते , न स्नान करते और न कभी दांत ही साफ करते थे । जाड़े के दिनों में वे किसी कक्ष की छाया में बैठकर तपस्या करते थे । गर्मी के दिनों में प्रचण्ड धूप में बैठकर अधिकतर वे पानी पीते ही नहीं थे । वह केवल 6 , 8 , 10 और 12 वे दिन कुछ खा लिया करते थे । अत : वे बिना किसी तृष्णा के अपनी साधनाओं में लगे रहते थे । "

इस तरह से उनकी तपस्या के 13 वर्ष में उन्हें एक नदी के तट पर शाल - वृक्ष के नीचे केवल्य ( निर्मल ज्ञान ) प्राप्त हो गया । तब से वे सुख - दुख से सदैव के लिए मुक्त हो गये। उसी समय से वे अर्हत ( पूज्य ) , जिन ( विजेता ) , निर्गन्थ ( बन्धन - रहित ) , महावीर ( परम - प्रतापी ) आदि नामों से विख्यात हुए ।

महावीर धर्म - प्रचारक के रूप में : महावीर जैन धर्म के एक सच्चे प्रचारक थे । उनमें जो कष्ट - सहिष्णुता थी वह सचमुच में अनुपमेय थी । वे हर प्रकार की यातनाओं को झेलते हुए भी जैन धर्म का प्रचार लगन के साथ करते रहे । सच्चा ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद वे कुछ दिनों तक प्रचार के लिये अकेले ही घूमते रहे । परन्तु कुछ ही दिनों के बाद जब वह नालन्दा पधारे तो वहाँ उन्हें घोषाल नामक एक सच्चा साथी मिल गया जो 6 वर्ष तक उसके साथ रहकर धर्म - प्रचार करता रहा । धर्म प्रचार के दौरान ही इन दोनों में मत - विभिन्नता आ गयी । फलतः दोनों एक दूसरे से अलग हो गये ।  

ठीक इसी समय भारत में वैदिक धर्म के कई सम्प्रदाय तथा कुछ नये धार्मिक दल भी अपने - अपने मत तथा धर्म का प्रचार कर रहे । इनमें बौद्ध , मैदान्तीय , नास्तिक , सांख्य और शैव धर्म प्रधान थे । इनका फैलाव भारत में अबाधगति से हो रहा था । वादों ( Ism ) का प्रचार भी तेजी पर था परन्तु महावीर ने साहस और धैर्य से काम लिया । वे अपने पथ से जरा भी विचलित नहीं हुए । वे अपने निशित मार्ग पर अग्रसर होते गये । समय ने पलटा खाया और सौभाग्य से उन्हें इस कार्य में अनेक राजाओं का महान सहयोग मिल गया । अब क्या था , मानो जैन धर्म में चक्का ही लग गया हो । अब उनकी प्रगति दिन दूनी और रात - चौगूनी होने लगी । महावीर ने भी साहस बटोरा और राजाओं तथा उनके परिवार के सदस्यों को अब भिक्षु अथवा भिक्षुणी बनाने लग गये । पद्यावती , जो चम्पारण नरेश की महिपि थी , महावीर की प्रथम जैन भिक्षुणी हुई । फलत : चम्पा नगरी जैन धर्म का सबसे बड़ा केन्द्र बन गयी । इनके बाद ही कौशाम्बी के राजा तथा उसकी रानी मृगावती ने भी जैन धर्म को स्वीकार कर लिया । 

अनेक गणराज्यों के राजा तथा प्रजा भी जैन धर्म को स्वीकार कर लिया । अनेक गणराज्यों के राजा तथा प्रजा भी जैन धर्म के झंडे के नीचे आ गये । इस तरह से महावीर अपने धर्म के प्रचार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक बहुत दिनों तक घूमते रहे तथा उपदेश देते रहे । कल्पसूत्र से हमें यह ज्ञात होता है कि वे मिथिला , चम्पा , वैशाली , राजगृह और श्रावस्ती आदि अनेक स्थानों पर वर्षों तक रहकर धर्म प्रचार करते रहे । कहा जाता है कि महावीर की . बिम्बिसार और अजातशत्रु के साथ अत्यधिक निकटता थी । इसलिए वे सदैव इनसे मिला करते थे । बुद्ध का प्रिय शिष्य उपालि भी पहले जैन ही था । महावीर के प्रधान शिष्य थे आनन्द , कामदेव , चुलानिपिया , सुरदेश , चुल्लासंयग , कुण्डकोलिय , संद्धाल पुत्र , महासंयग , मन्दिनीपिया और साल्होपिया इत्यादि , जिन्होंने अपने अथक परिश्रम से जैन धर्म की सेवा की तथा इसे स्थायी बना सके । अत : महावीर 30 वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे । अन्त में 72 वर्ष की आयु में 527 ई 0 पूर्व में वर्तमान , पटना जिले के पावापुरी नामक स्थान में इनकी मृत्यु हो गयी ।

जैन धर्म के सिद्धांत तथा उपदेश : महावीर स्वामी को जैन धर्म का जन्मदाता माना जाता है परन्तु , वास्तव में ऐसी बात नहीं थी । उन्हें जैन धर्म का केवल सुधारक ही समझना चाहिए क्योंकि इस धर्म का प्रतिपादन उनके पहले के जैनी महात्मा पार्श्वनाथ ने किया था । पार्श्वनाथ ने चार सिद्धांतों ( अहिंसा , सत्य , अस्तेय और अपरिग्रह ) का प्रतिपादन किया था । महावीर ने चार सिद्धांतों में अपना एक अलग सिद्धांत ब्रह्मचर्य भी जोड़ दिया था । महावीर स्वामी की शिक्षाओं के सारांश जिनमें जैन धर्म के मूल सिद्धांत निहित हैं , निम्नलिखित हैं -

( 1 ) अनीश्वरवाद : जैनी लोग ईश्वर को नहीं मानते । वे लोग ईश्वर के स्थान पर तीर्थन्करों की पूजा अर्चना करते हैं । उनको ही वे सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान मानते हैं । अत : संसार को वे लोग किसी की कृति नहीं मानते हैं । संसार तो अनादि और अनन्त है क्योंकि न इसके प्रारम्भ का पता है और न कभी इसका अन्त होता है , न कोई इसका निर्माता है और न उसका कोई बिगाड़ सकता है । यह सत्य है कि इसका उत्थान पतन होता है , परन्तु इसका अन्त नहीं । यह तो निरन्तर चलता रहता है ।

( 2 ) सृष्टि का जीवन तथा अजीव के संयोग से निर्माण : जैन धर्म के अनुयायियो विश्वास है कि सृष्टि का निर्माण जीवन और अजीब इन दो तत्वों के संयोग से हुआ है । अत : जीव और अजीव दोनों स्वतंत्र तथा नित्य है । जीव चेतन है और अजीव जड़ है । जैनो लोग जीव को ही आत्मा मानते है । अत : श्रेय केवल मनुष्य में ही नहीं है बल्कि पशुओ , पत्थरी , पेड़ - पौधों और जल में भी पाया जाता है । अत : इस सृष्टि का निर्माण जीव और अजीव दोनों तत्वों के सम्मिश्रण से ही हुआ है ।

 ( 3 ) आत्पवाद : जैनी लोग आत्मा के अस्तित्व को मानते हुए उसके अमरत्व को भी मानते है । उनके अनुसार आत्मा सर्वद्रष्टा होती है लेकिन धर्म बन्धन के कारण आत्मा को शक्ति कम हो जाती है । आत्मा क्रियाशील भी होती है । उसमें भी ज्ञान होता है । वह भी सुख - दुख का अनुभव करती है । आत्मा शरीर से अलग होती है लेकिन उसका कोई रूप नहीं होता । वह तो प्रकाश की भांति होती है । वह तो स्वभाव से ही निर्विकार होती है । 

( 4 ) जीव की भौतिक और आध्यात्मिक प्रवृतियों में विश्वास : जैन धर्म के अनुसार हरएक मनुष्य में दो तरह की प्रवृत्तियों होती है । एक है भौतिक और दूसरी है आध्यात्मिक । मानव की भौतिक प्रवृति विनाशशील होती है और वह मानव को बुरे कार्यों में फंसाकर विनाश के कगार पर ले जाती है । लेकिन मानव की आध्यात्मिक प्रवृति अमर होती है । उसका विनाश नहीं होता । वह मानव को सत्कर्मों की ओर झुकाती है । इसी का अनुसरण कर मानव सांसारिक साधनों से मुक्त हो सकता है । अत : प्रत्येक मनुष्य को इस आध्यात्मिक प्रवृति का अनुसरण करना चाहिए ।

 ( 5 ) कर्म की प्रधानता में विश्वास : जैनी लोग कर्म की प्रधानता में विश्वास करते है । उनका विश्वास है कि मनुष्यों के पहले जन्म के कर्मों से ही इस बाद का निर्णय होता है कि किस वंश तथा कुल में उसका जन्म होगा और उनका शरीर कैसा होगा । अत : जीव और आत्मा का उसके कामों के साथ अटूट ससंबंध रहता है । सांसारिक झंझटों में पड़कर मनुष्य कर्म करता है । आत्मा उसी कर्म के बन्धन में बंध जाती है । जब आत्मा इस बन्धन को तोड़ फोड़कर निकल जाती है तब उसे मोक्ष मिल जाता है । 

( 6 ) कर्मों के रोकने तथा हटाने की आवश्यकता : जैनियों का कथन है कि मोह , राग और द्वेष से प्रेरित होकर मनुष्य तरह - तरह के कार्य करता रहता है । इन कर्मों का प्रवाह आत्मा की ओर होता रहता है । इसी तरह के प्रवाह की जैनी लोग आश्रव कहते है । इस प्रवाह में बहते हुए एक दिन आत्मा सांसारिक बन्धनों में पूर्ण रूप से बंध जाती है । इसी से छुटकारा पाने के लिए कर्मों के इस प्रवाह को रोकना चाहिए । इस प्रवाह को रोकने को जन्मे लोग संवर कहते है । अत : प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि इस आसव को सारी ताकत लगाकर दृढ़ता के साथ रोके क्योंकि इसी से मनुष्य को मुक्ति मिलती है ।

( 7 ) त्रिरत्त्न का विधान : जैनियों का विश्वास है कि अज्ञानता के कारण मनुष्य , क्रोध , लोभ तथा मोह रूपी खाई में गिरता है । इससे बचने के लिए मनुष्य को सम्यक ज्ञान , सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र को अपनाना चाहिए । बिना त्रिरत्नों के मार्ग पर चले मुक्ति असंभव है । सम्यक ज्ञान से कशाय से मुक्ति मिलती है । सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति तीर्थन्करी के उपदेशों रो होती है और तीर्थन्करी में अपने विश्वास को पूर्ण रखना ही सम्यक दर्शन कहलाता है । सम्यक् चरित्र को हासिल करने के लिये मनुष्य को अपनी इन्द्रियो , कर्न और भाषण पर पूरा - पूरा नियंत्रण रखना चाहिए । इन निरलों पर विजय प्राप्त कर लेने को ही मुक्ति कहते है । 

( 8 ) पंच महावत : जीव को कर्मों के बन्धन से मुक्त करने की एकमात्र अन्दछी औषधि पंच महाव्रत ' ही है । ये पांच महाव्रत निम्नलिखित है-

( क ) अहिंसा : हरएक मनुष्य को अहिंसा का व्रत लेना चाहिए । मन , वचन और शरीर से भी हिसा होती है । अत : मनुष्य को हिंसा नहीं करनी चाहिए । कहने का अर्थ यह है कि निरपराधियों की हिंसा न की जाय । 

( ख ) सत्य : सत्य ही मानवता का भूपण है । अत : प्रत्येक मनुष्य को सत्य को अपनाना चाहिए । सत्य का केवल यह माने नहीं होता कि झूठ नहीं बोलना , बल्कि सत्य - भाषण , सुन्दर और मधुर भी होना चाहिए । सत्य पर विजय प्रापत करने से पहले मनुष्य को क्रोध , भय और लोभ पर विजय प्राप्त करना चाहिए ।

( ग ) अस्तेय : अस्तेय का शाब्दिक अर्थ होता है चोरी नहीं करना । अत : हर मनुष्य को चोरी नहीं करना चाहिए । लोग धन : दौलत की ही चोरी करते हैं लेकिन जैनियों के अनुसार धन तो मनुष्य का बाहरी जीवन होता है । अगर कोई किसी का धन चुराता तो वह उसका बाहरी जीवन लेता है । अत : धन लेना जीवन लेना है । अत : चोरी करना भी हिंसा करना है । इसलिए किसी को भी चोरी नहीं करनी चाहिए । 

( घ ) अपरिग्रह : अपरिग्रह का शाब्दिक अर्थ होता है संग्रह नहीं करना और न किसी चीज का लोभ ही करना । सम्पति संग्रह से ही मनुष्य में धन - लोलुपता बढ़ती है और अपने धन को बढ़ाने के लिए अनेक तरह का कुकर्म करना पड़ता है और कुकर्म भी हिंसा है और हिंसक व्यक्ति को कभी मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती । 

( ङ ) ब्रह्मचर्य , मन , वचन और कर्म द्वारा , पर - स्त्री समागम न करना , अपनी पत्नी में हो संतोष रखना और सियों के लिये अपने पति में ही संतोष रखना ब्रह्मचर्य व्रत कहलाता है । जैनी मुनियों को निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए - किसी सी से वार्तालाप नहीं करना चाहिए , किसी स्त्री की ओर दृष्टिपात नहीं करना चाहिए , अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिए और जहाँ औरतों का निवास हो वहाँ जैनी मुनियों को निवास नहीं करना चाहिए और जैन साधुनियों को मर्दो के निवासस्थान में नहीं रहना चाहिए ।


( 9 ) तीन गुणव्रत : पंच महावत के अलावा ये तीन गुणवत भी है । ये गुण व्रत कठोर व्रत के नाम से भी विख्यात है । इन व्रतों को धारण करनेवाले गृहस्थ को चाहिए कि एक निश्चित सीमा से बाहर नहीं जाकर निवास करने का व्रत ले । दूसरा व्रत है कि मनुष्य को कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे उसका सम्बन्ध नहीं , और तीसरा व्रत है आवश्यकता से अधिक भोजन नहीं करना ।

( 10 ) चार शिक्षाव्रत : चार शिक्षावत निम्नलिखित है- देश विरति , सामयिक व्रत , आठवीं और चौदहवीं को कार्य न करना और धर्म की बात करना और चौथी शिक्षा है - विद्वान अतिथियों और मुनियों का सम्मानपूर्वक स्वागत करना।

11 ) व्रत तथा तपस्या का महत्व : जो कर्म जीव में मिल गया है इससे जो दुःख होता है उससे छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है तपस्या करना । अत : तपस्या का अत्यधिक महत्व है । क्योंकि इसी से आत्मा को मुक्ति मिलती है । इसीलिए तो आमरण अनशन को जैन - धर्म में बड़ा ऊंचा स्थान दिया गया है । 

( 12 ) साधुओं का आदर्श : जैन - ग्रन्थों के अनुसार जैन - साधुओं के लिए निम्नलिखित आदर्श निश्चित किये गये हैं - पाप और घृणा से मुक्ति पाने के लिए साधुओं को किसी से सेह नहीं करना चाहिए । साधु को चाहिए कि आत्मा के सब बन्धनों को काट दे , किसी को मन , वचन और कर्म से क्षति नहीं पहुँचानी चाहिए और साधु को केवल अपने जीवन निर्वाह के लिये भिक्षा माँगनी चाहिए , धन संग्रह के लिए नहीं । 

( 13 ) तीर्थन्करों का उपासना में विश्वास : जैनी लोग ईश्वर में न विश्वास कर तीर्थन्करों को उपासना में ही विश्वास करते हैं । सभी तीर्थन्कर ही उनके देवी और देवता हैं और उनके उपदेश ही उनके लिए ईश्वर के उपदेश हैं , क्योंकि तीर्थन्कर ही सांसारिक बन्धनों से मुक्त , दुःखरहित , सर्वशक्तिमान , सर्वज्ञ और परमात्मन है ।

पढ़ने के लिए धन्यवाद